दशहरा कलश स्थापना का संपूर्ण विधि हिंदी में | Dashahara kasha sthapna hindi me

 यहाँ हमने दशहरा में होने वाले घर-घर मां दुर्गा के कलश स्थापना पूजा नव कन्या पूजन हवन इत्यादि के बारे में पूर्ण रूप से बिस्तर में बताने का पूरा कोशिश किया ।

बिहार में दशहरा का पर्व कैसे मनाया जाता है?

बिहार में दशहरा (दुर्गा पूजा) का पर्व बहुत ही धूमधाम और पारंपरिक तरीके से मनाया जाता है। यहाँ कलश स्थापना से लेकर रावण दहन और मूर्ति विसर्जन तक हर एक रस्म का विशेष महत्व होता है। आज के इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि बिहार के गाँवों और घरों में दशहरा का पर्व कैसे मनाया जाता है।

दशहरा मां दुर्गा का पूजा
मां दुर्गा की पूजा करती हुईमहिला

आपके यहाँ माँ दुर्गा और दशमी की पूजा किस तरह होती है, हमें कमेंट करके जरूर बताएं!

1. दशहरा की शुरुआत और घर की साफ-सफाई

दशहरा की तिथि आरंभ होने से पहले ही लोग अपने घरों में मांसाहारी भोजन (मीट-मछली) बनाना और खाना छोड़ देते हैं। इसके साथ ही घर की साफ-सफाई का दौर शुरू हो जाता है।

  • यदि घर कच्चा (मिट्टी का) होता है, तो मिट्टी में गोबर मिलाकर दीवारों और जमीन की अच्छी तरह से लिपाई-पुताई की जाती है।
  • घर के सभी बर्तनों और कपड़ों की अच्छी तरह धुलाई की जाती है।
  • इसके बाद पंडित जी से पूजा की सारी सामग्रियों की एक सूची (List) बनवा ली जाती है और बाजार से सभी सामान लाकर सुरक्षित रख लिया जाता है, ताकि पूजा के समय कोई कमी न रहे।

2. दशहरा का प्रथम दिन (नवरात्रि घटस्थापना की पूरी विधि )

दशहरा के पहले दिन सुबह-सुबह स्नान करके पूजा की सभी तैयारियां पूरी कर ली जाती हैं।

  • किसी पवित्र स्थान या खेत से साफ मिट्टी लाई जाती है। जिस स्थान पर कलश स्थापना (घटस्थापना) करनी होती है, वहाँ इस मिट्टी को अच्छी तरह फैलाकर साफ चौकी या वेदी बनाई जाती है।
  • इस दिन तरह-तरह के प्रसाद तैयार किए जाते हैं, जैसे हलवा, पूरी और ताजे फल। मुख्य रूप से घर में देवी के स्थान पर कलश स्थापना की जाती है और लगातार 10 दिनों तक वहाँ अखंड ज्योति जलती है।

कलश स्थापना में क्या-क्या सामान लगता है ?

कलश, दीया, ढकनी (ढक्कन), चावल, जौ, तिल, सरसों का तेल, गाय का घी, दही, दूध, बत्ती, नारियल का गोला, पान, सुपारी (कसैली), लौंग, इलायची, धूप, कपूर, शहद, मीठा (गुड़), आम का पल्लव (पत्ता), लाल सिंदूर, पीला सिंदूर, गुलाबी अबीर, हल्दी, दूर्वा (घास), गाय का गोबर, चुनरी, फूल और फूलों की माला, एक सिक्का (रांगा), गंगा जी की मिट्टी, अगरबत्ती, तथा सप्तमी के दिन विशेष रूप से—चुनरी, चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, पूरी, रंग-बिरंगी मिठाइयाँ, हलवा, बेल फल, और भतुवा (पेठा)।

 3. नौ कन्याओं के नौ रूप और उनके महत्व

दशहरा में नौ कन्याओं का पूजन का बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है दुर्गा सप्तशती के अनुसार 2 से 10 वर्ष की नव कन्याओं का पूजन किया जाता है उन्हें नव कन्याओं में मां दुर्गा का रूप माना जाता है .

दुर्गा सप्तशती के अनुसार नव कन्याओं का विवरण कुछ इस प्रकार है

1. कुमारीका 2 वर्ष :-  इनकी पूजा से दुखों और दरिद्रता का नाश होता है

2. त्रिमूर्ति 3 वर्ष  :- उनकी पूजा से धर्म अर्थ और मोक्ष की प्राप्ति तथा वंश प्रीति होती है

3.कल्याणी 4 वर्ष  :- उनकी पूजा से विद्या विजय सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है

4.रोहिणी 5 वर्ष  :-उनकी पूजा से rogo का नाश होता है और उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त होता है

5.कालिका 6 वर्ष :- उनकी पूजा से शत्रुओं का संहार और भाई से मुक्ति मिलती है

6.चंडिका 7 वर्ष  :- उनकी पूजा से धन ऐश्वर्य और सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती है

7.संभावित 8 वर्ष  :- उनकी पूजा से दुख दरिद्रता का निवारण और सफलता प्राप्ति होती है

8. दुर्गा 9 वर्ष :-  उनकी पूजा से कठिन से कठिन कार्य सिद्ध होते हैं और विघ्न दूर होते हैं

9.सुभद्रा 10  :-  वर्ष उनकी पूजा से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और लोग परलोक सुधार होता है 

ऐसा मानना है कि इन नौ कन्याओं के पूजा से धन दौलत की प्राप्ति और दुख का निवारण होता है

3. नवरात्रि के 9 दिनों की पूजा और नियम

  • दैनिक पूजा: प्रतिदिन सुबह और शाम दोनों समय पंडित जी आते हैं और माँ दुर्गा की आरती करते हैं, भोग लगाते हैं और हवन करते हैं। यह क्रम लगातार आठ दिनों तक चलता रहता है।
  • दुर्गा चालीसा: घर के सभी लोग सुबह और शाम के समय नियमित रूप से माँ दुर्गा चालीसा का पाठ करते हैं।

4. नवमी के दिन नौ कन्या पूजन (कन्या पूजन)

नवमी के दिन का विशेष महत्व होता है। नवमी से एक दिन पहले ही गाँव में घर-घर जाकर 9 वर्ष से कम उम्र की कन्याओं को अगले दिन यानी नवमी के दिन भोजन (कन्या पूजन) के लिए निमंत्रण दिया जाता है।

नौ कन्या पूजनविधि
नौ कन्या पूजन करती हुई भक्ति
  • कन्या पूजन की विधि:
    1. नवमी की सुबह उठकर सबसे पहले माँ दुर्गा की आरती की जाती है और प्रसाद बांटा जाता है।
    2. कन्याओं के स्वागत के लिए पूरी, हलवा, खीर और सेब, केला, अंगूर, अनार जैसे ताजे फल तैयार किए जाते हैं।
    3. घर के आँगन या कमरे में साफ-सुथरी चादर बिछाई जाती है, जिस पर सभी नौ कन्याओं को एक पंक्ति में बैठाया जाता है।
    4. इसके बाद किसी थाली या गमले में जल लेकर सभी कन्याओं के चरण (पांव) धोए जाते हैं और उनके चरणों पर अपना मस्तक झुकाकर आशीर्वाद लिया जाता है।
    5. सभी कन्याओं के माथे पर तिलक लगाया जाता है और उन्हें लाल रंग की चुनरी ओढ़ाई जाती है।
    6. इसके बाद पत्तल या थाली में पूरी, हलवा, खीर और प्रसाद परोसा जाता है। सभी कन्याएं एक साथ बैठकर भोजन करती हैं।
    7. भोजन के पश्चात अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार 5 रुपये से लेकर 50 रुपये तक दक्षिणा (नकद रुपए) और उपहार दिए जाते हैं। अंत में सभी कन्याओं को आदरपूर्वक विदा किया जाता है।

5. हवन की प्रक्रिया

नौवे दिन हवन करते हुए भक्त
मां दुर्गा का हवन करते हुए भकगण

अष्टमी या नवमी के दिन हवन का कार्यक्रम होता है।

  • हवन के लिए धूप, अगरबत्ती, चंदन, रोली, पान के पत्ते, नारियल, जौ, घी और हवन सामग्री पहले से मंगा ली जाती है।
  • माँ दुर्गा के कलश के पास आरती करने के बाद हवन शुरू होता है। जो व्यक्ति व्रत (फलाहार) रहता है, वह मुख्य रूप से हवन कुंड के पास बैठता है, और परिवार के अन्य सदस्य भी उसके आस-पास बैठते हैं।
  • पंडित जी मंत्रोच्चार करते हैं और हर मंत्र के अंत में 'स्वाहा' बोलते हैं। 'स्वाहा' की आवाज के साथ सभी लोग अपनी आहुति (हवन सामग्री) अर्पित करते हैं।
  • हवन पूर्ण होने के बाद, हवन कुंड के पास रखे बड़े-बड़े जवारे (जौ के पौधे) को उखाड़ा जाता है और परिवार के पुरुष सदस्य इसे अपने कानों में आशीर्वाद के रूप में लगाते हैं।

6. दशहरा का दसवाँ दिन (विजयदशमी और कलश विसर्जन)

विजयदशमी के दिन कलश के पास उगे हुए जवारों को सप्रेम उठाया जाता है।

  • कलश को बहुत ही सम्मान और सावधानी के साथ उठाया जाता है और एक नई टोकरी में रखा जाता है।
  • इसके बाद इसे गाँव से दूर किसी पवित्र नदी या तालाब में मंत्रोच्चार के साथ विसर्जित किया जाता है। विसर्जन के समय पंडित जी भी साथ होते हैं, जो विधि-विधान से पूजा-पाठ संपन्न कराते हैं।

7. रावण दहन का कार्यक्रम

विजयदशमी के दिन शाम को रावण दहन का भव्य आयोजन किया जाता है।

श्री राम द्वारा रावण का दहन
दशहरा में रावण दहन करते हुए लोग
  • इस दिन आवश्यकतानुसार 20 फीट से लेकर 50 फीट तक ऊंचे रावण का पुतला बनाया जाता है।
  • इसके अलावा भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता की झांकियां निकाली जाती हैं। पहले झांकी को पूरे गाँव में घुमाया जाता है, जिसके पीछे ढोल-नगाड़े और बाजे के साथ गाँव के लोग उत्साह से नाचते-गाते चलते हैं।
  • रात को 9, 10 या 12 बजे के आसपास भगवान राम के प्रतीक द्वारा रावण के पुतले पर तीर चलाया जाता है।
  • रावण के अंदर पहले से ही बहुत सारे पटाखे और आतिशबाजी भरी होती है, जिससे वह धू-धू कर जलने लगता है। इस ऐतिहासिक पल को देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग इकट्ठे होते हैं। रावण दहन के बाद लोग खुशी-खुशी अपने घरों को लौट जाते हैं।

8. रावण कहाँ से आता है?

रावण को वही लोग बना सकते हैं जो इसे पहले से बनाना जानते हैं। जिस ग्राउंड (मैदान) में रावण दहन होना होता है, वहीं कलाकारों को बुलाकर इसे बनवाया जाता है, या फिर इसे पहले से खरीदकर लाया जाता है। बिहार में रावण दहन सामान्य रूप से किया जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि 20 फीट से 50 फीट तक का वह विशाल रावण कहाँ से आता है? हमारे बिहार में रावण दहन के लिए रावण का बहुत बड़ा पुतला बाँस, कागज़ और लकड़ी से बनाया जाता है।


9. रावण बनाने में क्या-क्या सामग्री लगती है ?

रावण बनाने के लिए, जब भी हमारे गाँव में रावण बनता था, मैं दशहरा के दौरान वहीं मौजूद रहता था। मुझे रावण बनाने से जुड़ी लगभग सारी बातें पता हैं। यहाँ मैं 20 फीट का रावण बनाने के लिए आवश्यक सामग्री की एक सूची प्रस्तुत कर रहा हूँ:


1. -बाँस:-15 पीस (मध्यम आकार के)

2. रस्सी:- 10 किलो

3. कील:- 3 इंच और 2.5 इंच की, लगभग 3 किलो

4. सीढ़ी:- ज़मीन से ऊपर तक चढ़ने के लिए

5. कपड़ा:100 मीटर

6. रंगीन पेपर: अलग-अलग रंगों के, कुल 220 पीस (लाल, काला, नीला और हरा - प्रत्येक 100-100 ग्राम)

7. मिट्टी की हांडी: 10 पीस (रावण के दसों सिर बनाने के लिए)

8. पटाखे: रावण में जोड़ने के लिए लगभग 10,000 रुपये के पटाखे (आप अपनी आवश्यकतानुसार मात्रा कम या ज़्यादा कर सकते हैं)

9. लोहे का तार:रावण को गिरने से बचाने और सपोर्ट देने के लिए लगभग 5 किलो

10.धान का पावल (पुआल): यह रावण के अंदर डाला जाता है ताकि जलाते समय यह अच्छी तरह से जल सके। इसे ऊपर से नीचे तक अंदर की तरफ लगाया जाता है।

विशेष टिप:रावण को जलाने से पहले अंदर और बाहर दोनों तरफ मिट्टी का तेल (केरोसिन) छिड़का जाता है ताकि यह आसानी से और पूरी तरह से जल सके।

इतना सामान आपके पास उपलब्ध होना चाहिए, तब जाकर आप एक रावण बनवा सकते हैं। हमने यह जानकारी 20 फीट ऊंचे रावण को बनाने में लगने वाली सामग्री के आधार पर दी है। रावण की ऊँचाई और आकार के अनुसार सामग्री की मात्रा कम या ज़्यादा हो सकती है।

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