बिहार में दीपावली कैसे मनाया जाता है | how is Diwali celibrate in bihar 2026

 वैसे तो पूरे भारत में दीपावली मनाया जाता है लेकिन जैसे कि भारत में अलग-अलग राज्य है राज्यों के हिसाब से दीपावली के पूजा में थोड़ा बहुत अंतर रहता ही है यहां पर हमने बिहार में दीपावली किस तरह से मनाया जाता है उसको लिखा है .बिहार के लोग जो भी प्रदेश में काम करते हैं वह सभी लोग घर चले आते हैं क्योंकि दिवाली बिहार के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण पूजा है

बिहार में दीपावली कैसे मनाई जाती है: संपूर्ण विवरण

बिहार में दीपावली का त्योहार बहुत ही हर्षोल्लास और पारंपरिक तरीके से मनाया जाता है। यहाँ दीपावली से जुड़ी कई अनूठी और सुंदर परंपराएँ हैं, जिनका निर्वहन पीढ़ियों से किया जा रहा है। आइए जानते हैं कि बिहार में दीपावली का यह महापर्व कैसे मनाया जाता है:

बिहार में दीपावली कैसे मनाया जाता है |
बिहार में दीपावली कैसे मनाया जाता है | 

1. घरों की साफ-सफाई और लीपाई-पुताई

बिहार में यह मान्यता है कि साफ-सुथरे घर में ही माता लक्ष्मी का वास होता है। इसलिए, दीपावली से तीन-चार दिन पहले ही घरों के कोने-कोने की सफाई शुरू हो जाती है।

  • जिनके कच्चे मकान या मिट्टी के घर होते हैं, वहाँ दीवारों और आँगन की मिट्टी और गोबर से लिपाई-पुताई की जाती है।
  • पक्के मकानों में लोग अपने घरों की पुताई और पेंटिंग करवाते हैं।
  • घर के सभी सामानों और बर्तनों को धोकर चमकाया जाता है। इस दौरान महिलाओं की मेहनत और भागदौड़ देखने लायक होती है, और दीपावली के दिन पूरा घर चमक उठता है।

2. खरीदारी और पूजन सामग्री

दीवाली से एक दिन पहले ही बाजार से सभी जरूरी सामग्री घर ले आई जाती है।

  • घरों को रोशन करने के लिए बड़ी संख्या में मिट्टी के दीये खरीदे जाते हैं।
  • खाने-पीने के लिए लड्डू, चना, खुरमा और अन्य पारंपरिक मिठाइयाँ अपनी आवश्यकतानुसार लाई जाती हैं।
  • इसके साथ ही बाजार से माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की नई मूर्तियाँ खरीद कर लाई जाती हैं। जो लोग मूर्ति नहीं खरीद पाते, वे उनकी तस्वीर स्थापित करते हैं।

3. पकवान और मिठाइयाँ:

दिवाली के दिन ग्रामीण घरों में मिठाइयाँ बाहर से बहुत कम खरीदी जाती हैं, बल्कि उन्हें घरों में ही बनाया जाता है। घरों में ही चना और बेसन होता है जिससे स्वादिष्ट लड्डू बनाए जाते हैं, और ये लड्डू घर के शुद्ध घी से तैयार किए जाते हैं, जिनका स्वाद बेहद आनंददायक होता है। इसके अलावा, गुलाब जामुन और रसगुल्ला भी इस दिन घरों में बड़े चाव से बनाए जाते हैं। साथ ही, खाने के लिए पूरी, सब्जी, खीर, दही और फलों का प्रसाद तैयार किया जाता है। पूजा-पाठ की विधि पूरी होने के बाद, ये सभी पकवान वहाँ मौजूद लोगों में बाँटे जाते हैं और फिर परिवार के सभी लोग मिलकर इसका आनंद लेते हैं।

3. विधि-विधान से पूजा और दीपोत्सव

दीपावली की शाम को मुख्य पूजा का आयोजन होता है।

दीपावली लक्ष्मी गणेशपूजन
दीपावली के दिन माता लक्ष्मी और गणेश की पूजन करती हुई औरत
  • मूर्ति और तस्वीर को घर के पूजा स्थल पर स्थापित किया जाता है।
  • कई जगहों पर पंडित जी आकर मंत्रोच्चार के साथ विधिवत पूजा-अर्चना करवाते हैं।
  • पूजा संपन्न होने के बाद सबसे पहले मुख्य दीये प्रज्वलित किए जाते हैं। इसके बाद घर के हर कोने, दरवाजे और छज्जे पर दीये जलाने की शुरुआत होती है।
  • दीपों की रोशनी से पूरा घर दुल्हन की तरह जगमगा उठता है।

4. आतिशबाजी और बच्चों का उल्लास

पूजा और दीये जलाने के बाद बच्चों का उत्साह देखने ही बनता है। वे तुरंत पटाखों की तरफ दौड़ पड़ते हैं।

  • बच्चे मुख्य रूप से अनार, चकरी, फुलझड़ी और विभिन्न प्रकार के पटाखे जलाते हैं।
  • देर रात तक घरों के बाहर बच्चे आतिशबाजी का आनंद लेते हैं और चारों तरफ खुशियों का माहौल होता है।
  • इस दिन घरों में विशेष पकवान और स्वादिष्ट भोजन बनते हैं, जिन्हें परिवार के सभी सदस्य मिलकर एक साथ बैठ कर खाते हैं।

5, ग्रामीण दुकानों में दिवाली पूजा

घरों की तरह ही ग्रामीण दुकानों की भी अच्छे से साफ-सफाई की जाती है। दुकान को रंग-बिरंगी रोशनी और झालरों से सजाया जाता है। दिवाली और छठ पूजा दोनों त्योहारों को ध्यान में रखते हुए दुकानों में पहले से ही काफी माल स्टोर कर लिया जाता है। दिवाली के अवसर पर कई सामानों पर विशेष छूट (ऑफर) भी दी जाती है, कुछ दुकानों में तो 50% तक का डिस्काउंट मिल जाता है।

दुकानों की पूजा

दिवाली के दिन दुकानों में सुबह से ही ग्राहकों की भारी भीड़ रहती है। लोग खरीदारी में व्यस्त रहते हैं, इसलिए दिन के समय लक्ष्मी-गणेश जी की पूजा संभव नहीं हो पाती। यही कारण है कि दुकानों में पूजा रात के समय ही की जाती है।

रात होते ही पूरी दुकान को दीयों और मोमबत्तियों से जगमगा दिया जाता है। माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की दो छोटी मूर्तियां लाकर एक सुंदर आसन पर स्थापित की जाती हैं। इसके बाद प्रसाद तैयार किया जाता है और पंडित जी को बुलाकर विधि-विधान से लक्ष्मी-गणेश पूजन कराया जाता है।

पूजा संपन्न होने के बाद कई दुकानें रातभर खुली रहती हैं, क्योंकि रात में विशेष ऑफर के तहत सामान बिकता है और लोग देर रात तक खरीदारी करते हैं।

1. .कर्मचारियों (नौकरों) का सम्मान और बोनस

दिवाली के शुभ अवसर पर दुकान में काम करने वाले कर्मचारियों को विशेष बोनस दिया जाता है। उनकी सैलरी के साथ-साथ उन्हें नए कपड़े और मिठाइयां भी भेंट की जाती हैं। इसके अलावा, यदि दिवाली पर बिक्री अच्छी होती है, तो कर्मचारियों की सैलरी बढ़ने या अतिरिक्त इनाम मिलने की संभावना भी रहती है।

2.मिठाइयों का वितरण

पूजा के बाद दुकान पर आने वाले प्रत्येक ग्राहक को सामान के साथ-साथ मिठाई दी जाती है। यदि कोई नियमित (रेगुलर) ग्राहक दिवाली के दिन दुकान पर नहीं आ पाता, तो उसके हिस्से की मिठाई अलग रख दी जाती है और अगले दिन आने पर उसे दी जाती है। कुछ दुकानदार तो मिठाइयों के डिब्बे पैक करवाकर अगले दिन खुद ही अपने ग्राहकों के घर भिजवा देते हैं।

3. उधारी की वसूली और खाता चुकता करना

दिवाली के अवसर पर ग्रामीण दुकानदार अपने बही-खाते और बकाया पैसों का हिसाब-किताब भी करते हैं। इसके लिए वे एक छोटा सा "शुभ दीपावली" का निमंत्रण कार्ड छपवाते हैं। जिन ग्राहकों के पास दुकान का पैसा बकाया होता है, उनके घर यह कार्ड भेजा जाता है। इस कार्ड का विनम्र संदेश यही होता है कि पुराना बकाया चुकता कर दिया जाए। आमतौर पर लोग दिवाली से एक दिन पहले या दिवाली के एक-दो दिनों के भीतर अपना पूरा बकाया पैसा जमा कर देते हैं।

4. पारंपरिक खेल और सामाजिक परिवेश

बिहार के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में दीपावली की रात एक पुरानी परंपरा का जिक्र भी मिलता है। पूजा और उत्सव का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद, रात में कुछ पुरुष वर्ग छोटे-मोटे पासे या ताश के खेल (जिसे मनोरंजन या शगुन के रूप में देखा जाता है) में बैठते हैं। यह परंपरा बहुत पुराने समय से चली आ रही है, जिसे ग्रामीण समाज में इस रात का एक हिस्सा माना जाता है।

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दोस्तों, मैं विनोद कुमार आप लोगों के लिए ऐसे ही लेख लिखता रहता हूँ। हमारे बिहार में इस त्योहार को जिस अपनापन और परंपरा के साथ मनाया जाता है, उसका मैंने यहाँ विस्तार से वर्णन किया है।

आपके यहाँ दीपावली किस तरह मनाई जाती है? हमें नीचे कमेंट करके जरूर बताएं

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