1. सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ निर्णायक जंग Jeevika bihar
Jeevika Didi के ग्राम संगठनों ने शिक्षा, बाल विवाह, घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा, लैंगिक असमानता, भ्रूण हत्या और नशा मुक्ति जैसे गंभीर मुद्दों को अपने मुख्य एजेंडे में शामिल किया है।
- बाल विवाह पर अंकुश: जागरूकता अभियानों के फलस्वरूप आज गांवों में बाल विवाह की घटनाएं नगण्य हो गई हैं। संगठनों में यह स्पष्ट संदेश दिया जाता है कि 18 वर्ष से कम आयु में विवाह कानूनी अपराध होने के साथ-साथ बेटियों के स्वास्थ्य के लिए भी घातक है।
- शराबबंदी और नशा मुक्ति: बिहार में 2016 से लागू शराबबंदी कानून को सफल बनाने में जीविका दीदियों का योगदान अतुलनीय है, जिसकी सराहना माननीय मुख्यमंत्री स्वयं प्रत्येक मंच से करते हैं। हर साल 26 नवंबर को जीविका संगठनों द्वारा व्यापक स्तर पर 'नशा मुक्ति दिवस' मनाया जाता है।
2. सामाजिक कार्य समिति: न्याय की रक्षक
सामाजिक मुद्दों के त्वरित समाधान के लिए प्रत्येक ग्राम संगठन में Jeevika Didi 'सामाजिक कार्य समिति' का गठन किया गया है।
- कार्यप्रणाली: इस समिति में 3 से 5 निर्वाचित सदस्य होते हैं, जिनका मुख्य कार्य गांव में व्याप्त सामाजिक समस्याओं की जांच करना और उनकी विस्तृत रिपोर्ट ग्राम संगठन को सौंपना है।
- उपलब्धि: पूरे प्रदेश में अब तक 1,932 सामाजिक कार्य समितियों के सदस्यों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। इन समितियों ने बिहार भर में शिक्षा, घरेलू हिंसा, स्वच्छता, बाल विवाह और नशा मुक्ति से संबंधित 1,38,297 मामलों का सफलतापूर्वक समाधान किया है।
3. बदलता बिहार: स्वावलंबी और मुखर ग्रामीण महिलाएं
- आज बिहार का सामाजिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। जीविका से जुड़े लाखों परिवार गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकल चुके हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि ग्रामीण महिलाएं अब अपनी व्यक्तिगत और सामूहिक समस्याओं को निडर होकर ग्राम संगठन के मंच पर रखती हैं।
आवश्यकता पड़ने पर ये संगठन न केवल जागरूकता अभियान चलाते हैं, बल्कि अपनी 'संगठनात्मक शक्ति' का प्रदर्शन कर सामाजिक समस्याओं का तत्काल निराकरण भी सुनिश्चित करते हैं। यही कारण है कि आज समाज का हर वर्ग यह स्वीकार करता है कि जीविका के प्रयासों से ही बाल विवाह और घरेलू हिंसा जैसी कुरीतियों में भारी कमी आई है और लड़कियों की शिक्षा का अधिकार सुरक्षित हुआ है।
मुख्य विशेषताएं:
- कुल निराकृत मामले: 1,38,297 से अधिक
- प्रशिक्षित समितियां: 1,932
- नशा मुक्ति दिवस: 26 नवंबर
- मुख्य उद्देश्य: आर्थिक समृद्धि के साथ सामाजिक गरिमा की स्थापना।
1. ताने सुनने वाली शांति देवी बनीं लाखों की कारोबारी - जीविका दीदी
स्थान: महंत मनिहारी गांव, कुढ़नी प्रखंड, मुजफ्फरपुर।
एक समय था जब शांति देवी को उनके परिवार और पति ने यह कहकर नकार दिया था कि "बिजनेस तुम्हारे बस की बात नहीं है, तुम घर संभालो और खाना बनाओ।" यह बात शांति के मन में चुभ गई और उन्होंने इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया।Jeevika सफर की शुरुआत: जीविका से जुड़ने के बाद उन्होंने BRP (Block Resource Person) के रूप में काम शुरू किया। उन्होंने कृषि उद्यमी का प्रशिक्षण लिया और गांव-गांव जाकर किसानों को जैविक खाद और आधुनिक खेती की सलाह देने लगीं।
जीविका सफलता का आंकड़ा: पिछले 3 सालों में शांति ने अपनी मेहनत से कारोबार का टर्नओवर 2 लाख रुपये तक पहुँचा दिया है। आज वह खाद-बीज की दुकान और नर्सरी के माध्यम से 25,000 रुपये मासिक तक कमा रही हैं।
सरकारी सहयोग: उन्हें वन विभाग द्वारा 1,40,000 रुपये की सहायता भी मिली, जिससे उनका काम और आसान हो गया।
2. प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग योजना से बदला जीविका दीदी मीनू देवी का जीवन
- स्थान: भोज पंडौल ग्राम, विस्फी प्रखंड, मधुबनी।
18 साल की उम्र में शादी और पति की सीमित आय—मीनू देवी के लिए परिवार चलाना एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन उनके भीतर कुछ बड़ा करने की तड़प हमेशा बनी रही।
- जीविका नया मोड़: 2014 में वह जीविका के स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। उन्हें प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME) की जानकारी मिली।
- कारोबार: मीनू देवी घर पर 'लौड़ी' (बड़ी) बनाने का काम करती थीं, लेकिन पूंजी की कमी थी। सरकारी योजना से जुड़ने के बाद उन्हें वित्तीय सहायता मिली और उनके काम में तेजी आई।
- आज की स्थिति: आज मीनू अपने उत्पादों को अलग-अलग बाजारों में बेच रही हैं और उनकी मासिक आमदनी 15,000 से 20,000 रुपये हो गई है।
3. जीविका: केवल आर्थिक ही नहीं, सामाजिक क्रांति भी
- जीविका बिहार में सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम बनकर उभरी है। ग्राम संगठनों (Village Organizations) के माध्यम से महिलाएं अब सिर्फ पैसे ही नहीं कमा रही हैं, बल्कि कुरीतियों के खिलाफ आवाज भी उठा रही हैं।
सामाजिक मुद्दों पर प्रहार:
ग्राम संगठनों की नियमित बैठकों में अब निम्नलिखित मुद्दों पर गंभीर चर्चा और समाधान किया जाता है:
- बाल विवाह: 18 वर्ष से कम उम्र में शादी के खिलाफ जागरूकता।
- नशा मुक्ति: बिहार में 2016 से लागू शराबबंदी कानून को सफल बनाने में जीविका दीदियों का अतुलनीय योगदान है। हर साल 26 नवंबर को नशा मुक्ति दिवस व्यापक रूप से मनाया जाता है।
- दहेज प्रथा और घरेलू हिंसा: महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति सजग करना।
4. सामाजिक कार्य समिति (Social Action Committee):
पूरे प्रदेश में 1,932 सामाजिक कार्य समितियों के सदस्यों को प्रशिक्षित किया गया है। इन समितियों ने अब तक बिहार में शिक्षा, स्वच्छता और घरेलू हिंसा से संबंधित लगभग 1,38,297 मुद्दों का सफल निस्तारण किया है।
निष्कर्ष
आज बिहार का ग्रामीण परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। जीविका से जुड़े लाखों परिवार गरीबी के दुष्चक्र से बाहर आ चुके हैं। ये महिलाएं अब न केवल अपने घर की आर्थिक रीढ़ हैं, बल्कि समाज में बदलाव लाने वाली 'चेंजमेकर्स' भी हैं।
योजना से जुड़ाव ने बदली मीनू की जिंदगी: जीविका बनी महिला सशक्तिकरण की नई पहचान
- मधुबनी की मीनू देवी: संघर्ष से स्वावलंबन तक का सफर
मधुबनी। जिले के बिस्फी प्रखंड की रहने वाली मीनू देवी के जीवन की कहानी आज कई महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है। 18 वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह भोज पंडौल ग्राम के बिना चंद्र मिश्रा के साथ हुआ था। मीनू के पति मुंबई की एक कंपनी में कार्यरत थे, लेकिन उनकी सीमित आय से बड़े परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ उठाना अत्यंत कठिन था।
जैसे-जैसे जिम्मेदारियां बढ़ीं, मीनू के मन में कुछ नया करने और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने की भावना जाग्रत हुई। उनकी दो बेटियाँ और एक बेटा है। बेटियों की शादी कर उन्हें ससुराल विदा करने के बाद भी मीनू का कुछ कर गुजरने का जज्बा कम नहीं हुआ।
१. जीविका और सरकारी योजनाओं का मिला साथ
साल 2014 में मीनू देवी का जुड़ाव 'बंधन जीविका स्वयं सहायता समूह' से हुआ। यहाँ उन्हें जीविका परियोजना की बारीकियों और समूह की शक्ति का अहसास हुआ। मीनू ने समूह को बताया कि वह घर पर ही 'लौड़ी' (बड़ी) बनाने का काम करती हैं और उसे स्थानीय स्तर पर बेचती हैं, लेकिन पूंजी के अभाव में वह बाजार की मांग पूरी नहीं कर पा रही थीं।
जीविका के सहयोग से उन्हें केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित 'प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना' (PMFME) से जोड़ा गया। इस योजना से मिलने वाली वित्तीय मदद ने उनके व्यवसाय को नई गति दी। आज मीनू अपने उत्पादों को दूर-दराज के इलाकों में जाकर बेच रही हैं। उनकी मासिक आमदनी अब 15,000 से 20,000 रुपये तक पहुँच गई है। वह गर्व से कहती हैं कि एक सफल उद्यमी बनने का उनका सपना अब साकार हो चुका है।
जीविका: सामाजिक बदलाव की महाशक्ति
वर्तमान समय में जीविका बिहार में महिला सशक्तिकरण का पर्याय बन चुकी है। ग्राम संगठनों के माध्यम से न केवल महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधरी है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने में भी क्रांतिकारी बदलाव आया है।
सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार
जीविका के ग्राम संगठनों में अब केवल पैसों का लेन-देन नहीं होता, बल्कि सामाजिक मुद्दों को 'एजेंडा' के रूप में शामिल किया जाता है। इनमें प्रमुख हैं:
- शिक्षा और बाल विवाह: ग्राम संगठनों की सक्रियता से बाल विवाह की घटनाएं अब न के बराबर रह गई हैं। महिलाओं को जागरूक किया जा रहा है कि 18 वर्ष से कम उम्र में विवाह न केवल कानूनी अपराध है, बल्कि यह बेटियों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालता है।
- दहेज प्रथा और घरेलू हिंसा: इन मुद्दों पर निरंतर चर्चा और कानूनी जानकारी देकर महिलाओं को निडर बनाया जा रहा है।
- नशा मुक्ति अभियान: बिहार में 2016 से लागू शराबबंदी कानून को सफल बनाने में जीविका दीदियों की भूमिका अग्रणी रही है। हर साल 26 नवंबर को 'नशा मुक्ति दिवस' के रूप में व्यापक स्तर पर मनाया जाता है।
सामाजिक कार्य समिति: न्याय का स्थानीय मंच
समाज की समस्याओं को सुलझाने के लिए प्रत्येक ग्राम संगठन में 'सामाजिक कार्य समिति' का गठन किया गया है।
- संरचना: इसमें 3 से 5 सदस्य होते हैं जो सामाजिक मुद्दों की जांच कर अपनी रिपोर्ट ग्राम संगठन को सौंपते हैं।
- सफलता के आंकड़े: पूरे प्रदेश में अब तक 1,932 समितियों के सदस्यों को प्रशिक्षित किया जा चुका है। इनके प्रयासों से बिहार भर में शिक्षा, स्वच्छता, बाल विवाह और घरेलू हिंसा से संबंधित लगभग 1,38,297 मामलों का समाधान किया गया है।
बदलता सामाजिक परिदृश्य
- आज जीविका से जुड़े लाखों परिवार गरीबी के कुचक्र से बाहर निकल चुके हैं। ग्रामीण महिलाएं अब अपनी व्यक्तिगत और सामूहिक समस्याओं को निडर होकर ग्राम संगठन के समक्ष रखती हैं। जरूरत पड़ने पर ये महिलाएं एकजुट होकर अपनी 'संगठनात्मक शक्ति' का प्रदर्शन करती हैं और सामाजिक समस्याओं का त्वरित समाधान सुनिश्चित करती हैं।
बिहार का बदलता सामाजिक परिदृश्य इस बात का गवाह है कि जब महिलाएं संगठित होती हैं, तो समाज से बाल विवाह और दहेज जैसी कुरीतियां खुद-ब-खुद दम तोड़ने लगती हैं।
नारी शक्ति का परचम: कभी अपनों ने नकारा था, आज शांति देवी कर रही हैं लाखों का कारोबार
- मुजफ्फरपुर। समाज में अक्सर यह माना जाता है कि व्यापार करना महिलाओं के बस की बात नहीं है। मुजफ्फरपुर जिले के कुढ़नी प्रखंड अंतर्गत महंत मनिहारी गांव की शांति देवी भी कभी ऐसे ही तानों और तिरस्कार का शिकार हुई थीं। लेकिन आज उनकी सफलता उन सभी रूढ़िवादी सोच रखने वालों के लिए एक करारा जवाब है।
जब अपनों ने ही तोड़ा था भरोसा
- एक समय था जब शांति देवी के पति और परिवार वालों ने उन्हें यह कहकर हतोत्साहित किया था कि "बिजनेस करना तुम्हारे बस की बात नहीं है।" उनसे कहा गया कि वह घर पर रहकर केवल खाना बनाएं और बच्चों को पढ़ाएं। अपनों की यह बात शांति के मन में चुभ गई। उसी पल उन्होंने ठान लिया कि वह न केवल अपना कारोबार शुरू करेंगी, बल्कि समाज को यह भी दिखाएंगी कि एक महिला सफल व्यवसायी बन सकती है।
जीविका से मिला हौसला और प्रशिक्षण
शांति देवी के सपनों को पंख तब मिले जब वह जीविका से जुड़ीं।
- प्रशिक्षण: उन्होंने गिरिडीह से उद्यमिता का विशेष प्रशिक्षण लिया और तय किया कि वह अपनी एक छोटी दुकान खोलेंगी।
- बीआरपी के रूप में कार्य: जीविका से जुड़ने के बाद उन्होंने BRP (Block Resource Person) के रूप में काम शुरू किया और ग्रामीणों को खेती-बारी से संबंधित सलाह देना शुरू किया।
- जैविक खेती को बढ़ावा: एक 'कृषि उद्यमी' के रूप में उन्होंने गांव में अपनी दुकान खोली। शुरुआती दौर में वह घर-घर जाकर लोगों को जैविक खाद के फायदों के बारे में बताती थीं। उनकी मेहनत रंग लाई और दुकान की बिक्री तेजी से बढ़ने लगी।
लाखों का टर्नओवर और आर्थिक आजादी
पिछले 3 वर्षों में शांति देवी ने अपने परिश्रम से व्यवसाय को एक नई ऊंचाई पर पहुँचाया है:
- कारोबार: आज उनका मासिक टर्नओवर 2 लाख रुपये के करीब पहुँच गया है, जिससे उन्हें हर महीने 15,000 से 20,000 रुपये की शुद्ध आय होती है।
- नर्सरी का विस्तार: खेती के साथ-साथ उन्होंने नर्सरी खोलने का भी मन बनाया। इसमें जीविका और वन विभाग का संयुक्त सहयोग मिला।
- सरकारी सहायता: वन विभाग द्वारा उन्हें 1,40,000 रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की गई, जिससे नर्सरी का काम आसान हो गया और वहां से भी उन्हें अच्छी आमदनी होने लगी।
सफलता का संदेश
आज शांति देवी गर्व से कहती हैं कि जीविका और अपनी मेहनत की बदौलत वह हर महीने लगभग 25,000 रुपये कमा रही हैं। उनकी कहानी यह साबित करती है कि यदि महिला को सही अवसर और सहयोग मिले, तो वह फर्श से अर्श तक का सफर तय कर सकती है।
प्रमुख बिंदु (Highlights):
- नाम: शांति देवी
- स्थान: महंत मनिहारी गांव, कुढ़नी (मुजफ्फरपुर)
- उपलब्धि: 2 लाख रुपये का मासिक टर्नओवर
- कुल आय: ₹25,000 प्रति माह
- सहयोग: जीविका और वन विभाग

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